Rescue from incurable disease

Rescue from incurable disease
लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |

किडनी या गुर्दे का रोग विश्व में मौत का तीसरा कारण - कैसे बचें?

        गुर्दा या किडनी जो वृक्क के नाम से भी जाना जाता है, शरीर की एक अति महत्व पूर्ण रचना है। यह शरीर को निरंतर साफ करते रहने की स्वचालित प्रणाली है। गुर्दे कमर के ऊपर अपनी पीठ के बीच में अपनी रीढ़ के दोनों तरफ स्थित एक जोड़ी अंग हैं । जीवन बनाए रखने के लिए पाचन के बाद रक्त से अपशिष्ट और अतिरिक्त तरल पदार्थ को हटाने, रक्त को खनिजों (सोडियम, पोटेशियम, फास्फोरस,) और पानी के संतुलन को बनाए रखने, मांसपेशियों की गतिविधियों, और रसायनों या दवाओं के शेष रहे भाग को निकालने व एंजाइम रेनिन का उत्पादन कर रक्तचाप को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। ईरिथ्रोप्रोटीन का उत्पादन करके लाल रक्त कोशिका निर्माण करता है। हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक विटामिन डी के उत्पादन में सक्रिय भूमिका।

        किडनी या गुर्दे के क्षतिग्रस्त हो जाने से, शरीर की गंदगी या अपशिष्ट उत्पाद और अतिरिक्त तरल पदार्थ, शरीर में रहकर, सांस लेने में कठिनाई, नींद में कमी, जी मचलाना या उल्टी, जोढ़ों में सूजन पैदा कर सकते हैं। यदि अधिक समय तक चिकित्सा न की जाए तो क्षतिग्रस्त ओर रोगग्रस्त गुर्दे अंत में पूरी तरह से काम करना बंद कर सकते हैं, इसी गंभीर ओर घातक स्थिति को फैल होना कहते हें। 
        
         मोटापा, मधुमेह और तनाव किडनी के सबसे बड़े दुश्मन होते हें। विश्वस्तर पर कैंसर  और हृदय संबंधी रोगों के बाद मौत का कारण बनने वाली तीसरी बड़ी बीमारी किडनी की है। भारत में ही हर वर्ष दो लाख से अधिक किडनी फेल होने के मामले सामने आते हैं। क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) के हर दस में से सात मरीजों में किडनी के रोगों का कारण मधुमेह, हाइपरटेंशन और मोटापा पाए गए हैं। 
               गुर्दे या किडनी रोग में कुछ दिशानिर्देशों का पालन करके समस्या को गंभीर बनने से रोका जा सकता है।  क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) को क्रॉनिक रीनल डिजीज भी कहते हैं। इसके तहत गुर्दे के काम करने की क्षमता में धीरे-धीरे कमी आती चली जाती है। यही कारण है कि बड़े स्तर पर इससे प्रभावित लोगों में इस रोग की शुरुआत के कोई घातक लक्षण दिखाई नहीं देते।  पर चिंता की बात यह है कि पीड़ित लोगों में इस रोग के प्रति जानकारी का अभाव है,  और वे नियमित जांच व जीवनशैली में आवश्यक सुधार करने में लापरवाही बरतते हैं। बढ़ती उम्र, मोटापा, हाइपरटेंशन व मधुमेह का बुरा असर किडनी की कार्य प्रणाली पर पड़ता है। 

स्वस्थ कैसे रखें गुर्दों को ? 

(1) हमेशा फिट एवं ऊर्जावान रहें - प्रतिदिन नियमित व्यायाम एवं शारीरिक गतिविधियों से रक्तचाप व रक्त में शक्कर की मात्रा को नियंत्रित रहती है, ओर गुर्दा खराब नहीं होता।
(2) डायबिटीज पर नियंत्रण – शुगर की रक्त में निरंतर अधिक मात्रा(डायबिटीज) किडनी खराब करता है।
(3) उच्च रक्तचाप पर नियंत्रण – बड़ा हुआ रक्तचाप किडनी पर अतिरिक्त दबाव बना कर उसके काम में बाधक बनाता है। यह क्रोनिक किडनी रोग का कारण है।
(4) मोटापा संतुलित आहार एवं नियमित व्यायाम से नियंत्रित रखें। अधिक वजन शारीरिक शक्ति को कम कर अन्य रोग जैसे डायबिटीज, हृदय रोग एवं अन्य बीमारियों जिनसे क्रोनिक किडनी फेल्योर होता है।
(5) नियमित किडनी का चेकअप (जांच) जिनको किडनी की बीमारियों का खतरा होता है उन्हें किडनी की कार्यक्षमता की जांच प्राथमिकता से करवाना चाहिये।
(6) तम्बाकू एवं धूम्रपान का सेवन से ऐथेरोस्कलेरोसिस जिसमें रक्त नलिकाओं में रक्त का बहाव धीमा पड़ जाता है, ओर किडनी में रक्त कम जाने से उसकी कार्यक्षमता घट जाती है।
(7) चिकित्सक की सलाह के बैगर दवा दुकान से दवाओं की खरीद एवं उनका स्वयं सेवन किडनी के लिये खतरनाक हो सकता है। सामान्य दवाएं जैसे नाम स्टेरराईट, दर्द दूर करने वाली दवाएं नियमित रूप से लेने पर वे किडनी को नुकसान पहुंचा कर पूर्णत: खराब कर देती हें।

जाँचें - खून : रक्त में क्रिएटिनिन के स्तर का पता लगाने के लिए यह एक साधारण- जांच है। इससे किडनी की कार्यक्षमता का पता चल सकता है। गुर्दे या किडनी के रोग का जितना जल्दी हो पता चल जाना चाहिए। 

       अधिकतर मामलों में यह गुपचुप विना किसी विशेष चेतावनी के आ जाने वाला यह रोग अपनी गंभीर स्थिति होने पर मृत्यु का कारण बन जाता है। आवश्यक यह है, की चालीस पर आयु के बाद शुगर, ब्लड प्रेशर, कोलेष्ट्रोल आदि की तरह ही निरंतर किडनी की जांच भी करवाते रहना उचित कदम होता है।           

       मूत्र या पेशाब में क्रएटिनिन और एलब्यूमिन के लिए जांच की जाती है। जो लोग किडनी रोगों के चौथी स्टेज पर पर हैं, उन्हें स्क्रीनिंग ज़रूर कराना चाहिए। डाईविटीज या मधुमेह और उच्चरक्तचाप(HBP) के रोगी, मोटापे से पीड़ित और धूम्रपान के आदी, 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोग ओर वे लोग जिनके परिवार में किडनी रोगों, मधुमेह या उच्च रक्तचाप की हिस्ट्री रही हो की निरंतर ये जांच आवश्यक होती हें। 
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