Rescue from incurable disease

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लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |
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  • Basti Karma बस्ती कर्म – [An ayurvedic Enema Therapy].


    गुदा के माध्यम से ओषधियाँ शरीर में पहुंचाकर चिकित्सा करना बस्ती [1] कर्म कहता है| इसे एक प्रकार से वर्तमान एनिमा जैसा कह सकते हें, हालाँकि बस्ती उससे भिन्न है|
    बस्ती चिकित्सा भी आयुर्वेदीय पंचकर्म चिकित्सा के अंतर्गत रोगोपचार, रोगनिवारण, एवं चिकित्सा में सहायक के रूप में प्रयोग की जाती है| यह रोगो उपचार (preventive), निवारण (eradication) के साथ साथ सहायक चिकित्सा (promotives) करने में सक्षम है| कई आचार्य और चिकित्सक बस्ती कर्म को सम्पूर्ण चिकित्सा भी मानते हें| आचार्य चरक ने भी बस्ती-कर्म को विरेचन से श्रेष्ट कहा है| 
    बस्ती चिकित्सा में ओषधियाँ मुहं से नहीं दी जातीं इसलिए आमाशय (पेट) को कार्य नहीं करना पढता| इससे पाचन-पाचन (मेटाबोलिज्म) का समय बचता है, कम ओषधि प्रयोग से ओषधि में अधिक व्यय(खर्च) भी नहीं होता| परिणाम भी तुलनात्मक अधिक शीघ्र मिलता है|
    इस लाभ के आलावा कई रोगी विशेषकर बच्चे ओषधि स्वाद के ख़राब, कडवा, अस्वादु, तेलिय, आदि आदि होने से मुहं से नहीं ले पाते या मुश्किल होती है उनके लिए यह श्रेष्ट है|
    पंचकर्म क्रियाओं में बस्ती को विरेचन से श्रेष्ट कहा गया है| क्योंकि बस्ती देने पर विरेचन जैसा ग्रहणी अवरोध (Duodenal obstruction), और अग्निमांध (Loss of appetite) नहीं होता, इसीलिए विरेचन के बाद कराया जाने वाला संसर्जन क्रम करने की आवश्यकता नहीं होती|
    बस्ती देने से विरेचन की तरह अधिक कष्ट भी नहीं होता, एवं शीघ्र और सुख शोधन हो जाता है|
    विरेचन कर्म के द्वारा केवल शोधन ही होता है, जबकि बस्ती चिकित्सा में लेखन, ब्रहण, शोधन और उत्क्लेशन, भी हो जाता है| देखें- च. सू. 1/38-40 
    कर्मान्यद् बस्तिसमं न विद्यते शीघ्रसुखविशोधित्वात्,
    आशु अपतर्पणतर्पण योगात् च निरत्ययत्वात् च||
    आयुर्वेदीय चिकित्सा सिद्धान्त अनुसार चिकित्सा क्रम में वात दोष को सर्व प्रथम ठीक करना चाहिए क्योंकि, वात के करण ही पित्त, और कफ का शरीर के ने भागों में विस्तार होता है, यदि वात का शमन हो जाये तो रोग आगे नहीं बढ़ सकेगा| शरीर के मर्म (नेत्रादी vital organs) की क्षमता बढ़ने के लिए बस्ती-कर्म से बढ़कर कोई चिकित्सा नहीं| बस्ती से समस्त 80 तरह के वात विकार ठीक किये जा सकते हें|

    आजकल होने वाले निम्न रोगों की चिकित्सा में बस्ती (गुद) अधिक उपयोगी सिद्ध हुई है|
    • प्रोस्टेट वृद्धि (BPH) 
    • आमवात या गठिया (Rheumatism & gout), 
    • मूत्राशय की कमजोरी (atonik bladder), 
    • अस्थि मज्जागत वात avn, 
    • पीठ और गर्दन में दर्द, 
    • जीर्ण विवंध (constipation
    • मधुमेह के कारण झुनझुनी, सुन्नता होना (Diabetic neuropathy)
    • ध्वज भंग या नपुंसकता (erectil dysfunction)
    • ibs (इर्रिटेबल बोवेल सिंड्रोम (आईबीएस) रोगी को ऐंठन, पेट में दर्द, सूजन, गैस, दस्त या कब्ज जैसी समस्याएँ), 
    • बाँझपन (infertility)
    • रीड और गर्दन का स्पोंडिलोसिस (lumber & Cervical Spondylosis), 
    • MND[2]
    • Multiple Sclerosis[3]
    • मोटापा या मेदो रोग Obesity, 
    • अस्थिसंधिशोथ Osteoartheritis, 
    • पक्षाघात paralyasis, 
    • पेट में छाले (peptic ulcer)
    • Peripheral vascular disordars[4]
    • सर्वांग वात, गृध्रसी (sciatica), 
    • मेरुदंड विकृति (spinal cord disorder)
    • जीर्ण आंत्र शोथ, (subacute inflammatory bowel disease)
    Article -     उत्तर बस्ती- Ayurvedic treatment of Urethral stricture or Mutra ghat or Mutrotsang – Practical panchakarma procedure. मूत्राघात / मुत्रोत्संग/ मूत्र मार्ग संकोच (यूरिथ्रल स्ट्रीकचर) की आयुर्वेदिक चिकित्सा व्यावहारिक पंचकर्म चिकित्सा| विडिओ सहित 
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    Foot Note -
    [1]  बस्ती का यंहा अर्थ गुदा बस्ती, से है| इनके अतिरिक्त और भी कई बस्तियां होती है, जैसे स्त्री पुरुष के मूत्र मार्ग से दी जाने वाली 'उत्तर-बस्ती', और कटी बस्ती, जानू बस्ती, हृद बस्ती आदि जो गुदा से नहीं दी जातीं उनके बारे में अन्य लेख में जानकारी दर्ज किया जा रहा है|
    [2].Motor neuron disease (MND) मोटर न्यूरोन (तंत्रिका कोशिकाओं का प्रकार) रोग - यह रोग का एक गंभीर रूप है| आयु बढ़ने के साथ साथ रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क में तंत्रिकाओं उत्तरोत्तर अपक्षय होता जाता है| इसमें  मोटर न्यूरॉन्स (तंत्रिका कोशिकाओं के प्रकार) प्रभावित होते हैं। इन तंत्रिकाओं के प्रभावित होने से श्वास लेने, चलने, बोलने और निगलने, में उपयोग होने वाली मांसपेशियों नियंत्रित नहीं हो पातीं|  प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी, श्री स्टीफन हॉकिंग, और गिटार वादक श्री जेसन बेकर मोटर न्यूरॉन रोग से प्रभावित है|
    [3] शरीर की कई टिसुज का कठोर होना| Abnormal hardening of body tissue.
    [4] परिधीय रोग (पीवीडी) एक रक्त संचरण रोग है| यह हृदय और मस्तिष्क के बाहर नलिकाओं के सिकुड़ने, अवरुद्ध होने(ब्लॉक), या ऐंठन होने से बनता है| यह रक्त धमनियों या नसों में हो सकता है। इसके कारण सामान्यत:  दर्द होता है और थकान लगती है| एसा अधिकतर पैरों में विशेष रूप से व्यायाम, या अधिक परिश्रम के कारण होता है| आराम करने पर और अधिक बढ़ता जाता है| 
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