Rescue from incurable disease

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लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |
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  • कम सुनने के लिए कहीं स्वयं तो जिम्मेदार नहीं?

    काड़ी कान में डालने से बाहरी भाग में जमा मैल रुई द्वारा अंदर ठेल दिया जाता है।
         कान भी हमारा एक सच्चा साथी होता है, मृत्युपर्यंत यह स्वस्थ रहे इस हेतु इसे भी अनावश्यक छेड़ना नहीं चाहिए। हमेशा कान में में कुछ न कुछ डालते रहने की आदत हानिकारक होती है। यदि कान में खुजली आदि चलती है, तो इसका कारण सूखापन हो सकता है। यदि कान में कोई संकर्मण /पस या किसी प्रकार का पानी आदि नहीं आता हो, तो निरंतर तैल (ओषधि  या गर्म कर ठंडा किया तेल) डालते रहना चाहिए। जिस प्रकार नमी की बाहरी त्वचा को जरूरत होती है, उसी प्रकार कान के अंदर की नली को भी नमी की जरूरत होती है।
          यदि सब कुछ सामान्य है, तो कान में इस प्रकार की नमी की व्यवस्था प्रकृति ने की है, गले से कान तक एक बारीक नली द्वारा। सबने अनुभव किया होगा की जब भी कोई अपने नाक या कान में कोई ओषधि आदि डालता हें, तो उसका स्वाद मुह में आ जाता है। यह एक प्राक्रतिक व्यवस्था है। नहाते समय यदि पानी चला जाए तो वह संकर्मण कर सकता है। इससे बचने के लिए तैल एक प्रकार से पानी रोकने का काम भी करता है।
      शरीर के विसर्जित होने वाली गंदगी जैसे पसीना आदि ओर बाहरी धूल मिट्टी कृमि हवा के साथ कान में जाते रहते हें। ओर वे जम भी जाते हें। शारीरिक प्रक्रिया इसे बाहर करने के लिए उकसाती है, इससे हम हाथ उंगली कान को साफ करने अंदर  डालने की कोशिश करते रहते हें। जब सफल नही होते तो पास में पड़ी किसी भी चीज से कान साफ करने की कोशिश करते हें।
    'ईयर बड़' से भी हो सकती है हानि-       
    कुछ लोग इसके लिए 'ईयर बड़' को जो एक हायजीनिक रुई को एक सलाई पर लपेट कर बनाई जाती है से को कान में डालकर साफ करते हें, ओर समझते हें की हम ठीक कर रहें हें। यह बड चिकित्सकों के प्रयोग के लिए बनाई गई है| रुई की काड़ी आदि से भी कान साफ करने की कोई जरूरत नहीं है। दरअसल कान के अंदर की बनावट और कार्यप्रणाली ऐसी है, कि वह स्वयं अपनी देखभाल कर लेता है। साफ सफाई भी स्वतः हो जाती है। कान की नली से तेल और मोम निकलता है, जो धूल कणों को कान के और अंदर जाने से रोकता है। बाद में यही वसा मैल के रूप में अपने आप कान से बाहर निकल जाता है। इस तरह तैल और मोम कान को सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं।
         'ईयर बड़' या  काड़ी कान में डालने से बाहरी भाग में जमा मैल रुई की गांठ द्वारा और अंदर ठेल दिया जाता है।  धीरे धीरे वह कान के अंदर के भाग में जमा होकर कठोर गांठ जैसी बना देता है। यह गांठ आने जाने वाली ध्वनि तरंगो को रोकती है, इससे उस व्यक्ति को धीरे-धीरे कम सुनाई देने लगता है, और कान में दर्द,  सीटी की आवाज भी सुनाई देने लग सकती है। कुछ समय बाद यह मैल की गांठ पानी आदि जाने से कान के दर्द ओर संक्रमण का कारण भी बन जाती है।
            अक्सर लोग इस बात की गंभीरता को नहीं समझ मनमाना घरेलू या क्वेक्स की सहायता से चिकित्सा लेते हें। इसका परिणाम वे हमेशा के लिये अपनी आंशिक या सम्पूर्ण श्रवण शक्ति खो बैठते हें।
          कान में दर्द की तकलीफ  कान के अंदर सूजन या सक्रमण के कारण हो सकती है। यदि बाहरी कान में सक्रमण हो, तो उसे ओटाइटिस एक्सटर्ना कहते हैं। यदि कान के मध्यवर्ती भाग में सक्रमण हो, तो उसे ओटाइटिस मीडिया कहते हैं। कभी-कभी कान के पर्दे में गीलापन आ जाता है।
                इसके अतिरिक्त कान के दर्द के अन्य कारण जैसे जुकाम, बुखार, नाक बहना व सिरदर्द भी सभव है। यह शिकायत तीन से सात दिनों में स्वत: ठीक हो जाती है।
        ओटाइटिस, कान में सूजन होने को कहते हें। इसमें कान दर्द बढ़ता जाता है। भूख कम लगती है, थूक व खाना निगलने में दर्द महसूस होता है। चिड़चिड़ापन, नींद न आना व चक्कर आता है। कभी-कभी कान से सफेद पीला या भूरे पस का रिसाव हो सकता है। सुनने की शक्ति भी कम होती जाती है। नाक, कान व गला विशेषज्ञ द्वारा इस रोग का ओटोस्कोप व ऑडियोमीट्री द्वारा परीक्षण कराया जाता है।ओटाइटिस एक्सटर्ना के इलाज में कान का मैल हटाया जाता है। दर्द निवारक दवाओं और एंटीबॉयोटिक्स द्वारा आराम मिल जाता है। कुछ मामलों में एक मामूली सर्जरी माईरिनगोटॅमी द्वारा भी इलाज करना होता है।

     क्या करें?  
    1. स्वस्थ कान में प्राकर्तिक चिकनाहट आती रहती है, इससे तैल आदि की जरूरत नही होती।  पर यदि कान सूखा रहने लगा है, तो वही सरसों या जैतून का तैल जिसे लहसुन आदि के साथ गरम कर शुद्ध बना लिया है, रोज नहीं तो दो तीन दिन में डालते रहें। कच्चा तैल हानी पहुंचाता है। 
    2.  मैल के कारण भी कान में खुजली की शिकायत हो सकती है। कान में एक्जिमा या सोरायसिस भी हो सकता है, जिसकी वजह से भी लगातार खुजली चलती है और बेचैनी रहती है। इसका पता कान की जांच से चल सकता है।  
    3. खुजली को शांत करने के लिए कुछ लोग सेफ्टीपिन, माचिस की काड़ी,ऑलपिन या पैंसिल की नोंक का इस्तेमाल करते हैं। ये सभी वस्तुएं कान को स्थायी क्षति पहुंचा सकती हैं।
    4. नहाने या नदी,स्विमिंग पूल आदि में जाने के पूर्व कानों को ईयर प्लग या रुई लगाकर पानी जाने से रोकना चाहिए। 
    5. केवल बहकर बाहर आ रहा मैल विसंकर्मित रुई की बड़ से साफ करते रहना चाहिए। सावधान बड़ अधिक अंदर न जाने पाये। 
    6. प्रतिदिन नहाते-धोते रहने से थोड़ा बहुत पानी कान में जाता है, जो कान को साफ करता रहता है, अत: प्रतिदिन नहाने से कान में मैल भी जमा नहीं होने पाता। 
    7. नहाने के बाद बोरेलिन या बोरोप्लस जैसी कोई एन्टीसेप्टिक क्रीम छोटी अंगुली से कान में लगते रहने से भी कान में खुश्की या मैल आदि नहीं जमता, ओर कान स्वस्थ्य रहने की संभावना बड़ जाती है।
    8. कान में यदि अधिक समय तक दर्द आदि हो तो कान के विशेषज्ञ को दिखा देना ही बुद्धिमानी है। 
    9. लंबे समय तक तेज ध्वनि सुनने के कारण तेज ध्वनि ईयर ड्रम को क्षति पहुंचाकर उन्हें पतला कर देती है। बहुत ज्यादा लाउड म्यूजिक सुनने से कानों की रोम कोशिकाएं अस्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। कानों पर इसका प्रभाव नहीं पता चलता, जिससे इनका इलाज नहीं हो पाता और बहरापन स्थायी हो जाता है।
    10. दर्द होने पर सूती रूमाल को गर्म करके कान पर रखकर कान की सिकाई करें, लाभ होगा।
    11. गला खराब हो तो गर्म पानी के गरारे करने चाहिए। इससे कान दर्द से बचा जा सकता है।
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